रविवार, 4 दिसंबर 2011

जिंदगी

इस जिस्म का हर कतरा है तेरे लिए
इस जिंदगी का हर लम्हा है तेरे लिए
मेरा दिल कोई राजमहल तो नहीं, पर
इसका हर कोना है तेरे लिए.

ख्वाबों का दरिया रुकने का नाम नहीं लेता
तनहाइयों का साया साथ छोडने का नाम नहीं लेता
उफ़ ये जिंदगी  भी क्या है दोस्त
दुःख  का दरिया  सूखने का नाम नहीं लेता.

लाया था  जो मुझको इस दुनिया के चमन में
खुद  छोड़ कर चला गया तारों के गगन में
न तू रही   तेरे  प्यार का आँचल रहा
बस तेरी तस्वीर रह गयी है नयन में.

शनिवार, 5 नवंबर 2011

क्या लिखूं

क्या लिखूँ कैसे लिखूँ , पद्य लिखूं या गद्य लिखूँ
लिखूँ कहानियां प्रेमचंद सी या तुलसी सी कबिता - छंद लिखूँ.

 मासूम बचपन की आज़ादी, स्कूल – कॉलेज की बृहद पढ़ाई
कर्रिएर का वो कठिन संघर्ष, या बढती उम्र का द्वन्द लिखूँ.

गुल्ली-डंडा कांची-कंचा, चांदनी रात का वो  झाबर खेल
छिपी-छिप्पम और कबड्डी या नौटंकी-मेले का स्वछन्द लिखूँ.

दुद्धी,पटरी की घुटाई, गिनती पहाड़े की रटाई
मास्टर जी की वो पिटाई या हल्ला-गुल्ला बंद लिखूँ.

गणित - विज्ञान के लंबे सूत्र, परिभाषा की बोझिल भाषा
अलंकार-व्याकरण की वो गुत्थी या साहित्य का मकरंद लिखूँ.

रोज़गार  के ढेरों एप्लीकेशन, उसके बाद का कम्पटीशन
फेल होने की वो मायूसी या सफलता का आनन्द लिखूँ.

नौकरी की आपाधापी,रोमांस- मस्ती और फिर शादी
बीबी-बच्चों की वो जिम्मेदारी या माँ-बाप की सेहत मंद लिखूँ.

पन्ने इतिहास के लिखूँ या  विज्ञान के ज्ञान बिखेरूं
माया का वो कसता फन्दा या भक्ति परमानन्द लिखूँ.

पैरों-घुटनों और बदन का दर्द,पेट,फेफड़ों ,साँस का मर्ज़
शिथिल पड़ती वो इन्द्रियों का मर्म या जीवन के अनुभव चंद लिखूँ.

  

शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

शुरुआत

आज मैं ब्लॉग बनाकर बहुत अच्छा अनुभव कर रहा हूँ.देखना है इसके द्वारा मैं अपने बिचारों एवं अनुभवों को दुनिया के सामने कैसे पेश कर पाता हूँ.आज बस इतना ही, नया हूँ न.पाठकों को नमस्कार एवं धन्यवाद....के आर मौर्य